मंज़िल और सफर एक-दूसरे के पूरक ही तो हैं,
जिसमें सफर सुकून तो मंज़िल तो बस जरूरत हैं
मगर इसी मंज़िल की आड़ में सफर को ही किया अनदेखा है
देखना इसी मंज़िल
मंज़िल कैसी भी हो
ये नहीं तो वो ,वो नहीं तो ये मिल ही जाती है
लेकिन वो मंज़िल ही क्या जिसमें सफर.का सुकून ही न.हो
लेकिन उस मंज़िल का सुकून तभी है
जब सफर आनंदमय रहा हो...
मंज़िल कैसी भी हो
मिल ही जाती है
लेकिन उस मंज़िल का सुकून तभी है
जब सफर आनंदमय रहा हो...
क्योंकि उस मंज़िल को पाने के बाद फिर एक नया सफर शुरु होता है...
सुनो क्या तुम सच में कुछ कहना नहीं चाहते
या फिर कहना ही नहीं चाहते ,
वैसे ये अतीत का बोझ कब तक उठाए रखना चाहते हो
सुना है मेरी जिन्दगी का कुछ भरोसा नहीं,
ऐसा भी क्या जो जुबां तक आते हुए भी नज़रे फेर लेना चाहते हो,
खैर इतना मैं ही सोच रही या फिर तुम भी इन छींटो से खुद नहीं बचा पा रहे
अब क्या ही कहना इन सब पे बस एक ही ख्याल आता है
सच में कुछ है भी कि बस मेरे ही ख्याली पुलाव पके जा रहे
जो भी हो ये क्या कम है मेरे लिए ही कि मै भी इस तरफ भी खुद को यूं खोया पा रही
जो इतने सालों के बाद भी बुझा न पा रही
न जाने ये कैसा मोड़ आ गया है न खुद ही समझ पा रहे न समझा पा रहे
लोग तो मुझे विरोधाभासी ख्यालो से जोड़कर देखे जा रहे
न जाने क्यों
शायद अब पता चल पा रहा पहला
कभी तो आप भी कुछ कहो,
कभी तो आप भी अपने को सुनाओ
यूं ही ये खामोशियां कब तक
एक मुस्कराहट से संभलती रहेगी,
यूं तो बहुत ही व्यस्तता में रही है ज़िन्दगी
लेकिन एक बार खुद ही से तो मिल जाओ
लोग क्या सोचेंगे ये कहकर खुद ही से नज़रे तो न चुराओ,
माना कि उलझे हैं खुद की कहानियों में...
लेकिन एक बार किसी के किस्से को साथ में तो सुलझाओ
फिर क्या इन किस्सों का कहानियों में तब्दीली शायद ही हो,
और फिर क्या किस्से,किसकी कहानी,,,
सब बस यूं ही रह जाएंगे,
कभी इसकी,कभी उसकी जुबानी...
मंज़िल और सफर एक-दूसरे के पूरक ही तो हैं, जिसमें सफर सुकून तो मंज़िल तो बस जरूरत हैं मगर इसी मंज़िल की आड़ में सफर को ही किया अनदेखा है देख...