क्या पता क्लास के नंबर में फर्स्ट आने के बजाय जिन्दगी की किताब में बाजी मार जाए।
किसी को गिराकर आगे बढ़ने के बजाय उसको उठाने में भले ही
पीछे हो जाए,
शायद आज कुछ नया सीख जाए,
क्लास में एक नया एडमीशन हुए उसको क्या अपना दोस्त बनाया
या फिर उसक
मंज़िल और सफर एक-दूसरे के पूरक ही तो हैं, जिसमें सफर सुकून तो मंज़िल तो बस जरूरत हैं मगर इसी मंज़िल की आड़ में सफर को ही किया अनदेखा है देख...
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