सुनो क्या तुम सच में कुछ कहना नहीं चाहते
या फिर कहना ही नहीं चाहते ,
वैसे ये अतीत का बोझ कब तक उठाए रखना चाहते हो
सुना है मेरी जिन्दगी का कुछ भरोसा नहीं,
ऐसा भी क्या जो जुबां तक आते हुए भी नज़रे फेर लेना चाहते हो,
खैर इतना मैं ही सोच रही या फिर तुम भी इन छींटो से खुद नहीं बचा पा रहे
अब क्या ही कहना इन सब पे बस एक ही ख्याल आता है
सच में कुछ है भी कि बस मेरे ही ख्याली पुलाव पके जा रहे
जो भी हो ये क्या कम है मेरे लिए ही कि मै भी इस तरफ भी खुद को यूं खोया पा रही
जो इतने सालों के बाद भी बुझा न पा रही
न जाने ये कैसा मोड़ आ गया है न खुद ही समझ पा रहे न समझा पा रहे
लोग तो मुझे विरोधाभासी ख्यालो से जोड़कर देखे जा रहे
न जाने क्यों
शायद अब पता चल पा रहा पहला
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