तो हर बेज़ुबा इंसान शब्दों का मोहताज होता.....
शब्दों को ऐसे भी क्या पिरोना ,
कि शब्दों को समझने वाला भी निःशब्द हो जाए......
कुछ भी कहो,,,,,शब्दों की लड़ाई में ,
इन भावनाओं का क्या क़ुसूर ,यदि शब्दों में समा ही न पाए........
अब तो जीने में क्या ही मजा है,
यदि हर कोई ,हर किसी को शब्दों में समझ पाए......