कभी खुद पर ही नाराज़गी,
तो कभी बेवज़ह उदासी,
किसी पर खुद ही बङबङाना,
खुद ही सुनना,
कभी चिल्लाना,
फिर कभी झल्लाना,
फिर सोचना क्या ही है,
कुछ भी तो नहीं,
फिर कभी खो जाना उसमें,
और फिर खुद ही मुस्कराना ,
शायद इसी को कहते हैं,
ज़िन्दगी का एक और नज़राना......
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