बचपन से तो केवल पढ़ा-लिखा समझा कुछ नहीं,बङे हुए तो इतना समझ लिया कि ज़िन्दगी जिया नहीं,,,
मंज़िल और सफर एक-दूसरे के पूरक ही तो हैं, जिसमें सफर सुकून तो मंज़िल तो बस जरूरत हैं मगर इसी मंज़िल की आड़ में सफर को ही किया अनदेखा है देख...
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