यहीं अब बात आती है हमारे माता-पिता की,अब बच्चे बङे हो गए हैं तो वे जाहिर सी बात है आज की आधुनिकता की तकनीकि युग में हम परिवार के विरूद्ध ही जाते नज़र आएंगे क्योंकि ऐसी व्यवस्था उनके समय में नहीं तो अवश्य वे इन सब के विरूद्ध होगें मतलब वे बच्चों के विरूद्ध.....
अब बच्चा क्या करे आज इसी की मांग है तो परिवार की नज़र में वह एक असंस्कारी घोषित कर दिया जाता है।
वहीं जहां तक आधुनिकीकरण के इस युग में हमारे जीविका में जिस प्रकार से परिवर्तन हो रहे हैं पैरेंट्स को बिल्कुल भी हज़म ही नहीं हो रहा,वहीं बच्चे भी जोर देकर कहे जा रहे कि आप को आज के रहन-सहन के बारे में नहीं पता तो आप चुपचाप बैठो,अब क्या पैरेंट्स बैठ गए अपराधबोध लेकर, क्या हमने यही संस्कार दिए थे अपने बच्चों को .....अब लो इतना बड़ा अपराधबोध किस बात का ,यही आजकल बुजुर्गों की अवसाद की समस्या का कारण बन रहा है,वो अन्ततः एकदम अकेले पड़ जाते हैं,,,इसीलिए नहीं कि वे बूढ़े जो चुके हैं बल्कि इसलिए कि वे दिमाग से भी बूढ़े हो चुके हैं पुरानी पीढ़ी नई पीढ़ी को स्वीकार ही नहीं कर पा रही ये बहुत बड़ी समस्या है,,,ये उन परम्पराओं से होकर निकले हैं तो इसका मतलब ये बिल्कुल नहीं है कि वे अपने बच्चों के लिए अपराधबोध में जिएं ,अरे ये उस समय में कारगर रहीं होंगी तो ऐसा हुआ होगा जिससे ये उनके "अवचेतन मन" से निकाल पाना कठिन हो जाता है,इसलिए हमें एक-दूसरे के साथ सामंजस्य बिठाकर चलना होगा ,हमें रूढ़िबद्ध तरीके से नहीं *तार्किकता* के साथ लचीलेपन से अपनाना सीखना होगा,तभी हम एक-दूसरे में तालमेल बिठा पाएंगे।
अगर हम इस "जेनेरेशन गैप" पर वास्तव में हल निकालना चाहते हैं तो बहुत से विकल्प हैं यदि नहीं तो फिर हम अवसाद के लिए तैयार रहें.....
जेनेरेशन गैप भविष्य में बढ़ने ही वाली है,,,इसे हम इस प्रकार से भी कम कर सकते हैं हमें ऐसा "माइंड मैप" तैयार करना होगा जिससे हम तार्किकता के साथ बच्चों से भी हम बुजुर्गों(पुरानी पीढ़ी)को खुशी के साथ सीखते रहना चाहिए,, इससे दिमाग हमेशा कुछ नया करने के लिए प्रेरित होता रहेगा क्योंकि खाली दिमाग हमेशा गलत दिशा में ही जाता है।
हमें बच्चों की खुशियों में उल्लास के साथ खुद को शामिल करना होगा,देखना बच्चे भीआपकी(पुरानीपीढ़ी) परम्पराओं को अवश्य जानने की कोशिश करेंगे कि कैसे वे उनकी ज़िन्दगी का हिस्सा बनी और वह उस समय की तार्किकता रही होगी ,,जो आज वही रूढ़िवादिता में परिवर्तित हो जाती है,और भविष्य में यही कल रूढ़िवादिता मे परिवर्तित नज़र आ सकती है ,तो यह एक प्रकार से चक्रीय प्रक्रिया ही कह सकते हैं ,जो शायद हमेशा चलती रहे जब तक ये धरती रहेगी.......।
।।*कल्पना विश्वकर्मा*।।
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