इससे तो वही अच्छा है हमें उसकी जरूरत ही क्या है,
चलो खुद को खंगालते हैं,यही तो जानने की सब की इच्छा है,
वरना कौन पूंछेगा हमें यह कहकर कि ये तो उसी की समीक्षा है.........
-कल्पना विश्वकर्मा
मंज़िल और सफर एक-दूसरे के पूरक ही तो हैं, जिसमें सफर सुकून तो मंज़िल तो बस जरूरत हैं मगर इसी मंज़िल की आड़ में सफर को ही किया अनदेखा है देख...
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