कि हम खुल के जी न पाएं.....
ऐसा क्या ही है कि हम खुद को स्वीकार न कर पाए,
क्यों बदलना ही है किसी को ,क्यो खुद ही न बदल जाए,
ऐसा भी क्या ख़फा होना इस ज़िन्दगी से, कि मुंह से मरने तक की बात निकल जाए....
चलो एक दिन साथ बैठते हैं ना,कि कुछ पल खुल के जी लिया जाए.....
वरना ज़िन्दगी का वैसे भी क्या भरोसा, कौन पहले या कौन बाद चला जाए......
क्यों न एक बार फिर से उन बचपन की यादों को फिर से ताजा कर लिया जाए.......
छोड़ों इस दुनिया को मां, चलो फिर से खुद को खुद के साथ एक कर दिया जाए....❤️🙏
।। कल्पना विश्वकर्मा ।।
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