ये काफी आश्चर्यजनक था खुद के लिए
कि खुद में जो है वो उसके सामने प्रकट हो सका
कभी सोचा न था कि खुद को ऐसा जान सका
कभी तो आप भी कुछ कहो,
कभी तो आप भी अपने को सुनाओ
यूं ही ये खामोशियां कब तक
एक मुस्कराहट से संभलती रहेगी,
यूं तो बहुत ही व्यस्तता में रही है ज़िन्दगी
लेकिन एक बार खुद ही से तो मिल जाओ
लोग क्या सोचेंगे ये कहकर खुद ही से नज़रे तो न चुराओ,
माना कि उलझे हैं खुद की कहानियों में...
लेकिन एक बार किसी के किस्से को साथ में तो सुलझाओ
फिर क्या इन किस्सों का कहानियों में तब्दीली शायद ही हो,
और फिर क्या किस्से,किसकी कहानी,,,
सब बस यूं ही रह जाएंगे,
कभी इसकी,कभी उसकी जुबानी...
मंज़िल और सफर एक-दूसरे के पूरक ही तो हैं, जिसमें सफर सुकून तो मंज़िल तो बस जरूरत हैं मगर इसी मंज़िल की आड़ में सफर को ही किया अनदेखा है देख...