हमारे परिवार में हर कार्य जेंडर के हिसाब से बंटे हुए हैं, क्या यह अब भी खत्म नहीं हो सकता काम कोई भी हो दिमाग में ये न आए ,,,
मेल है तो तुझे बाहर का कार्य करना और फीमेल है तो तुझे अंदर का करना है.......
क्या ऐसा नहीं हो सकता कार्य कोई भी हो कभी भी जेंडर के आधार पर सोच ही न आए........
कितना अच्छा हो न अगर हमारा परिवार और समाज कुछ ऐसा हो कि बस एक इंसान के नज़रिए से देखा जाए,,,
**कभी रात-दिन जैसा कोई भेद भी आड़े न आए,,,
ये न सोचना पड़े ,अरे अभी तो रात है वह कैसे जाएगी ,जमाना बड़ा ही खराब है,,अरे अभी तो दोपहर है ये कैसे जाएगी,,काली पड़ जाएगी,,,अरे अभी सुबह के चार बजे हैं बाहर कैसे टहलने जाएगी,,,घर के छत पर ही टहल ले न...**🙈
¤ॐकल्पना विश्वकर्मा☪︎†
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